आओ जाने केशवानंद भारती केस के बारे में जाने
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) का मामला भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक मील का पत्थर है, जिसने "संविधान के मूल ढांचे" (Basic Structure) के सिद्धांत को जन्म दिया। इस ऐतिहासिक फैसले ने यह स्पष्ट किया कि संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन वह इसके मूल स्वरूप या बुनियादी ढांचे को नहीं बदल सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
- याचिकाकर्ता: केरल के कासरगोड जिले में स्थित एडनीर मठ के प्रमुख, केशवानंद भारती (Kesavananda Bharati)।
- विवाद: केरल सरकार ने 1969 के भूमि सुधार अधिनियम (Kerala Land Reforms Act) के माध्यम से मठ की संपत्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अधिग्रहित कर लिया।
- चुनौती: केशवानंद भारती ने 1970 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर केरल सरकार के इन कानूनों को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि ये कानून उनके मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से संपत्ति के अधिकार (जो उस समय एक मौलिक अधिकार था) और धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन के अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत) का उल्लंघन करते हैं।
मुख्य कानूनी मुद्दे
इस मामले में मुख्य संवैधानिक प्रश्न यह था कि क्या संसद के पास संविधान के किसी भी हिस्से, यहाँ तक कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की असीमित शक्ति है?
सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला (24 अप्रैल, 1973)
- सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की अब तक की सबसे बड़ी पीठ ने इस मामले की सुनवाई की।
- पीठ ने 7:6 के बहुमत से फैसला सुनाया।
- न्यायालय ने यह माना कि संसद के पास संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन करने की शक्ति है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है।
- न्यायालय ने "संविधान के मूल ढांचे" (Basic Structure Doctrine) का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत के अनुसार, संसद कोई ऐसा संशोधन नहीं कर सकती जिससे संविधान के बुनियादी तत्व या मूल भावना नष्ट हो जाए या बदल जाए।
- इस फैसले ने पिछले गोलकनाथ मामले (1967) के फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
महत्व और प्रभाव
- इस फैसले ने भारतीय लोकतंत्र में "संविधान की सर्वोच्चता" को स्थापित किया और विधायिका की शक्तियों पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक अंकुश लगाया।
- इसने सुनिश्चित किया कि सरकारें बहुमत के आधार पर संविधान के मूल सिद्धांतों को मनमाने ढंग से नहीं बदल सकतीं।
- "मूल ढांचा" सिद्धांत आज भी भारतीय संवैधानिक कानून में एक आधारशिला है, जो भारतीय संविधान के मूल मूल्यों और सिद्धांतों की रक्षा करता है।

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